यू पी बदायूं: ‘शेर’ की विदाई और वो नम आंखें… क्या वाकई न्याय हुआ?

यू पी बदायूं: ‘शेर’ की विदाई और वो नम आंखें… क्या वाकई न्याय हुआ?
​बिसौली: विदाई समारोह तो बहुत देखे होंगे, लेकिन ऐसी विदाई शायद ही पहले कभी देखी हो। बिसौली कोतवाल राजेंद्र सिंह पुंडीर के विदाई समारोह में शायद ही कोई ऐसा शख्स था जिसकी आंखें नम न हों। चाहे वो आम नागरिक हो, पत्रकार साथी हों या उनका अपना स्टाफ—हर किसी के चेहरे पर एक ही सवाल था… “क्या यह सही हुआ?”
​ साजिश या इत्तेफाक?
​कुछ सवाल ऐसे हैं जो अंग्रेजी वर्णमाला के ‘साइलेंट लेटर’ की तरह चुप हैं, लेकिन चुभ रहे हैं:
​जो व्यक्ति सड़क पर फर्राटे से मोटरसाइकिल चला सकता है, वो दृष्टिहीन कैसे हो सकता है?
​घटना का वीडियो खुद बनाना, उसे तीन दिन तक रोक कर रखना और फिर ‘अपेक्षा’ पूरी न होने पर वायरल करना… क्या यह किसी प्लानिंग का हिस्सा नहीं लगता?
​वीडियो में सिर्फ उतना ही हिस्सा दिखाया गया जिससे छवि धूमिल हो, लेकिन सिक्के का दूसरा पहलू पर्दे के पीछे ही रहा।
​”धोखे से शेर को पिंजरे में कैद किया गया”
​दुख इस बात का नहीं कि कार्रवाई हुई, दुख इस बात का है कि एक ईमानदार अफसर को उसकी नैतिकता और भाईचारे की सजा मिली। एक कोतवाल अपने अधीनस्थ दरोगा के लिए अपशब्द कैसे बर्दाश्त कर लेता? अगर मेरे भाई को कोई गाली दे, तो शायद मैं और आप भी वही करते जो पुंडीर साहब ने किया।
​ जनता की अदालत में ‘लाजवाब’ पुलिसिंग
​आमतौर पर कार्रवाई के बाद लोग दूरी बना लेते हैं, लेकिन यहाँ नजारा उल्टा था। सैकड़ों लोगों का हुजूम और उनकी नम आंखें इस बात का प्रमाण हैं कि राजेंद्र सिंह पुंडीर ने लोगों के दिलों पर राज किया है। उनकी कर्तव्यनिष्ठा और व्यवहार ही उनकी असली ताकत है।
​अंत में बस इतना ही… लिखने को बहुत कुछ है, पर शब्द कम पड़ रहे हैं। शेष फिर कभी।

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