बदायूं : “सुविधाजनक” बुलडोजर कार्रवाई! ​सैंजनी में एचपीसीएल कांड

बदायूं : “सुविधाजनक” बुलडोजर कार्रवाई! ​सैंजनी में एचपीसीएल कांड के आरोपी के परिवार की 11 दुकानें जमींदोज। मार्ग अब ‘अतिक्रमण मुक्त’ है।
भैया जी कहिन “प्रशासनिक मोतियाबिंद” का हुआ सफल ऑपरेशन! 🏥
​बधाई हो! बदायूँ के थाना मूसाझाग क्षेत्र के ग्राम सैंजनी में प्रशासन को अचानक ‘दिखना’ शुरू हो गया है। 11 दुकानों का अतिक्रमण ढहा दिया गया, क्योंकि आरोपी अजय प्रताप सिंह पर गाज जो गिरी है।
​लेकिन जनता का सवाल भी जायज है:
जब ये 11 दुकानें बन रही थीं, तब क्या साहब लोगों के चश्मे का नंबर खराब था? या फाइल पर रखे “वजन” ने उनकी पलकें झपकने नहीं दीं? 😉
​सच तो ये है कि बुलडोजर सिर्फ सीमेंट-कंक्रीट पर नहीं, बल्कि उन कुर्सियों पर भी चलना चाहिए जिन्होंने अपनी आंखों के सामने इस अवैध साम्राज्य को पलते-बढ़ते देखा। जड़ तो वो अधिकारी हैं जो पहले ‘बढ़ावा’ देते हैं और फिर ‘बुलडोजर’ चलाकर नायक बनते हैं।
गुनहगार सिर्फ वो नहीं जिसने बनाया, बल्कि वो भी है जिसने बनने दिया! 👊
​सैंजनी (दातागंज) में आज 11 दुकानों पर पीला पंजा चला। बहुत अच्छी बात है, मार्ग अतिक्रमण मुक्त होना ही चाहिए। लेकिन एक छोटा सा सवाल:
​ये दुकानें रातों-रात तो खड़ी नहीं हुई होंगी? तब कौन सा विभाग कुंभकर्णी नींद सो रहा था?
​जब निर्माण हो रहा था—तब अधिकारी ‘मौन’ थे।
​जब जेबें गरम हो रही थीं—तब अधिकारी ‘अंधे’ थे।
​अब जब आरोपी पर ‘आंच’ आई—तो अधिकारी ‘सक्रिय’ हो गए।
​असली बुलडोजर तो उन भ्रष्ट अधिकारियों की साख पर चलना चाहिए जिन्होंने अपनी ड्यूटी से समझौता किया। जनता सब देख रही है साहब!
विद्वानों का कहना है कि जब ये दुकानें बन रही थीं, तब प्रशासन ‘ध्यान मुद्रा’ में था। जैसे ही कांड हुआ, प्रशासन ‘एक्शन मोड’ में आ गया। काश! ये ‘एक्शन’ तब हुआ होता जब पहली ईंट रखी गई थी, तो आज इतने बड़े फसाद की नौबत ही न आती।
​वैसे, उन अधिकारियों के घर का पता क्या है जिनकी ‘निगरानी’ में ये दुकानें तान दी गई थीं? उनके घर का रास्ता भी थोड़ा संकरा लग रहा है! 😉👇
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