अतरौलिया के प्राथमिक विद्यालय एदिलपुर में जो हुआ, उसने इंसानियत को झकझोर कर रख दिया। कक्षा-तीन का छोटा सा बच्चा हिमांशु राजभर, जो हर दिन की तरह पढ़ने गया था, उस दिन बस थोड़ी देर के लिए अपनी ही क्लास में सो गया। उसे क्या पता था कि उसकी यही मासूम नींद उसे घंटों की कैद और दर्द दे जाएगी।
स्कूल की छुट्टी हुई, बच्चे घर चले गए, लेकिन एक मासूम पीछे छूट गया। किसी ने उसे जगाने की कोशिश नहीं की… किसी ने ये देखने की जरूरत नहीं समझी कि कोई बच्चा अंदर तो नहीं है। शिक्षक और स्टाफ ने दरवाजों पर ताला लगाया और अपने घर चले गए—पीछे छोड़ गए एक डरा हुआ, अकेला बच्चा।
कमरे के अंदर बंद हिमांशु… भूख से बिलखता, प्यास से तड़पता, डर के साए में रोता रहा। बाहर उसकी मां फूला देवी अपने बेटे को ढूंढती रही—गांव की गलियों में, बच्चों से पूछती हुई, हर दरवाजे पर उम्मीद लेकर जाती हुई… लेकिन कहीं कोई जवाब नहीं।
आखिरकार जब एक मां का दिल उसे स्कूल तक खींच लाया, तो जो नज़ारा सामने था, उसने हर किसी की आंखें नम कर दीं। बंद कमरे के अंदर से रोने की आवाज… और अंदर था वही मासूम, जो घंटों से मदद का इंतजार कर रहा था।
दरवाजा खुला… और हिमांशु रोता हुआ बाहर आया—डरा हुआ, सहमा हुआ, लेकिन जिंदा।
उसकी आंखों में डर था… और उस डर ने पूरे गांव को गुस्से में बदल दिया।
लोगों का कहना है—अगर मां समय पर नहीं पहुंचती, तो शायद कोई बड़ी अनहोनी हो सकती थी।
ये सिर्फ एक लापरवाही नहीं… ये एक मासूम के भरोसे के साथ खिलवाड़ है।
जिस स्कूल में बच्चों को सुरक्षित होना चाहिए, वही उनके लिए डर की जगह बन जाए—तो सवाल सिर्फ जिम्मेदारी का नहीं, इंसानियत का भी उठता है।
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