नौशेरा के शेर” ब्रिगेडियर मुहम्मद उस्मान। ये वो नाम जो वतनपरस्ती की मिसाल बन गया।
आज के दिन यानी 3 जुलाई, उनका यौम-ए-शहादत है। 1948 में जब पूरा कश्मीर जल रहा था, उस वक़्त ब्रिगेडियर उस्मान ने अपनी जान की बाज़ी लगाकर नौशेरा को पाकिस्तानी क़ब्ज़े से बचाया।
वो ब्रिगेडियर रैंक पर शहीद होने वाले पहले और इकलौते भारतीय अफ़सर थे। दुश्मन ने उनकी सिर की क़ीमत ₹50,000 रख दी थी। मगर वो झुके नहीं, डरे नहीं… शहादत को गले लगा लिया।
उनके जनाज़े में मुल्क की बड़ी हस्तियाँ मौजूद थीं।
देश के पहले शिक्षा मंत्री मौलाना अबुल कलाम आज़ाद ने उनकी नमाज़-ए-जनाज़ा पढ़ाई, वहीं उनके जनाजे में देश के पहले प्रधानमंत्री नेहरू, प्रथम राष्ट्रपति डॉ. राजेंद्र प्रसाद, प्रथम भारतीय गवर्नर राजगोपालाचारी और इंदिरा गांधी भी मौजूद थीं।
उन्हें जामिया मिल्लिया इस्लामिया के ऐतिहासिक क़ब्रिस्तान में पूरे इज़्ज़त और एहतराम के साथ दफ़न किया गया।
ऐ ब्रिगेडियर उस्मान!
तुमारी जुरअत, तुमारी कुर्बानी, और तुमारा नाम — हमेशा हमारे दिलों में ज़िंदा रहेगा।
तोम वाक़ई “नौशेरा का शेर” थे… और रहोगे।
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